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दिल्ली का महाशून्य / सातकड़ि होता

किसान मेला समाप्त हो गया था। देश के कोने-कोने से लाखों लोग आए हुए थे इस मेले में। मेला खत्म होने के बाद सब अपने-अपने घर चले गए। पति का हाथ पकड़ कर रास्ता पार करते समय बसन्ती देवी ने कहा, “जिसको जाना है वह चला जाए। हमने अभी तक कुछ भी नहीं देखा है। इतना दूर आकर दिल्ली देखना हमारे किस्मत में कहाँ? दो- चार दिन देर से लौटने से नहीं होगा।” भवानन्द बाबू ने कहा, “क्यों नहीं होगा। छुट्टी बढ़ा दी जाएगी। आए है तो, चार-पाँच दिन यहाँ रूककर दिल्ली, आगरा,मथुरा और वृंदावन घूमकर जाएंगे। हो सकता है कि और कभी नहीं आ पाए। “ रास्ते का जाम खुल गया था। हाथ छुड़ाते हुए बसंती देवी कहने लगी, “शरम नहीं आती है, अभी भी हाथ पकड़े हुए हो। सभी देख रहे हैं हमारी तरफ।” भवानन्द ने उत्तर दिया, “वे मुझे नहीं देख रहे है तुम्हारा हाथ पकड़े हुए। वे देख रहे है तुम्हारे जैसी सुंदरी मेरे साथ कैसे है। देख रही हो, तुम्हारी तरफ कितनी आंखें घूर रही हैं। “ बसंती देवी अपना पल्लू ठीक करते हुए कहने लगी, “मज़ाक करने के लिए यही समय मिला है। और समय नहीं मिला। मुझे क्या देखेंगे वे लोग;! देख रहे है, वे सब कैसे दौड़ रहे हैं। हो न हो वे ...

एक सुबह का खाका / तरुण कांति मिश्रा

मेरे पिताजी ने मेरी तरफ घूमते हुए मुझसे पूछा,” जल्दी बताओ, सत्तरह अट्ठा .... ...?" एक आँख बंद कर दूसरी आँख से आसमान की ओर देखते हुए जैसे मैं उनके साथ नीचे उतर रहा हूँ। पके सितारा फल का तेज स्वाद अभी मेरी जीभ भी पर मौजूद था। मैंने थूक गटकते हुए कहा,” सात अट्ठा छप्पन ....." "नहीं, नहीं सात अट्ठा नहीं। मैंने पूछा है सत्तरह अट्ठा। बताओ, जल्दी से “ "सत्तरह अट्ठा;? ठीक है, बताता हूँ।” और मैंने मन ही मन में अंकों को गुणा करना शुरू किया। पिताजी सोचने लगे कि मैं उन्हें धोखा देने की कोशिश कर रहा हूँ। अपना हाथ हवा हिलाते हुए उन्होंने मुझे तुरंत जवाब देने के लिए कहा। “सत्तरह अट्ठा एक सौ छत्तीस“ "ठीक है।“ मेरे पिताजी ने कहा। हालांकि वह मेरे जवाब से इतने खुश नहीं थे। इसलिए कि मैंने जल्दी से जवाब नहीं दिया था और मुझे गुणा करने में अधिक समय लगा। उन्हें संतुष्टि केवल इस बात की थी कि मैं गुणा कर सकता हूँ;! मुझमें प्रतिभा है , लेकिन मुझे ज्यादा मेहनत और कठिन श्रम करने की जरूरत है। मेरे पिता ने यह बात मुझे कई बार कही थी। उन्होंने मुझे कई ऐसी कहानियाँ और दृष्टांत सुनाए थे ...

एक नया वर्ष / देवदास छोटराय

देवदास छोटराय, 67, कवि, गीतकार, अपने गृहनगर कटक के प्रति अनन्त प्रेम। कविताओं, कहानियों ,गीतों के अतिरिक्त फिल्मों के लिए लेखन। प्रकाशित पुस्तकें;:- नील सरस्वती लाल,मछ,हटी सजकरा सम्मान;:- ओडिया फिल्म “इंद्रधनुर छाई (इंद्रधनुष की छाया)” जिसे सन 1995 में कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित किया गया था ,उसकी पटकथा के लिए अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित । रोमांटिक लेखन के लिए बहु प्रशंसित। Contact: devdasofcuttack@gmail.com (अभी तक मेरे जीवन में सिवाय कुछ भ्रामक किताबों और एक धोखेबाज लड़की को छोड़कर कुछ भी नहीं था। हर दिन मैं उसके सफ़ेद झूठ सुनता और सारी रात सरासर अहंकार से किताबें पढ़ता। रात गहराती जाती। मेरी थकी-मांदी आँखों को सड़क की नियोन-लाइटें बड़े संतरे की तरह नजर आने लगती। और उस झूठी चमक के साथ दूसरा दिन शुरू होता। काश! मुझे यह पता होता कि झूठ बोलने की आदत पर केवल उसका ही विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उसकी दादी माँ की जीभ पर भी हर समय झूठ चिपका रहता है।) इकतीस दिसम्बर मेरे लिए बहुत ही कष्टकारक है, नहीं तो, क्यों मैं अपने आपको इतना लाचार महसूस करता? और पहली जनवरी मुझे डराती। मुझे...

नागाफाकी / मोनालिसा जेना

मोनालिसा जेना का जन्म 1964 में मुकुन्द प्रसाद, खोर्द्धा में हुआ। आप एक प्रसिद्ध लेखिका, अनुवादक,पत्रकार और कवियत्री हैं। उन्होने ओड़िया तथा अँग्रेजी में कई पुस्तकें लिखी हैं। ओड़िया में उनके ‘निसर्ग ध्वनि’, ’ए सबू ध्रुवमुहूर्त’, ’नक्षत्रदेवी’ तीन कविता-संग्रह है तथा एक कहानी-संग्रह ‘इंद्रमालतीर शोक’ है। उन्होने असमिया साहित्यिक कृतियों (दोनों कविता और कथा) को ओडिया में अनुवाद किया है। इसके अतिरिक्त कई प्रसिद्ध ओड़िया साहित्यिक कृतियों (गद्य और पद्य दोनों) का अंग्रेजी में अनुवाद किया है । उनकी कविताएं अधिकतर प्यार, लालसा, जुदाई, और मिलन पर केंद्रित है, और उनके माध्यम से बदलती दुनिया में मानवीय-रिश्तों को प्रतिबिंबित करती है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार, कादम्बिनी पुरस्कार, और साहित्य के लिए केदारनाथ रिसर्च फाउंडेशन पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली एक वरिष्ठ रिसर्च फैलोशिप होने के कारण उन्होने ओड़िया और असमिया साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर भी विशिष्ट काम किया हैं।</i> रात के साढ़े ग्...

प्रतिबिंब / सरोजिनी साहू

जब वह पहुँचे थे, तब नीपा अपनी दैनिक दिनचर्या में काफी व्यस्त थी। एक हाथ में उसके टोस्ट था, तो दूसरे हाथ में पानी का एक गिलास। डाइनिंग-टेबल के पास खडी होकर, वह किसी भी तरह टोस्ट को गटक लेना चाहती थी। इस प्रकार उसने सुबह का नाश्ता खत्म कर लिया था। अब सेल्फ से चप्पलें निकाल कर पहन ली थी, हाथ-घड़ी बाँध ली थी, नौकरानी को दो-तीन कामों के बारे में आदेश भी दे चुकी थी, सोने के कमरे का ताला भी लगा चुकी थी। अब वह सोच रही थी घर से निकल कर ड्यूटी पर चले जाना चाहिये। ऐसे हड़बड़ी के समय में शरीर की तुलना में मन कुछ ज्यादा ही सक्रिय होता है। मन के साथ ताल-मेल मिलाकर काम करते समय, कोई अगर उसे रोक देता, यहाँ तक कि अगर टेलिफोन की घंटी भी बज उठती तो उसके लिये असहनीय हो जाता। वह तुरंत ही तनाव-ग्रस्त हो जाती। मन ही मन वह नाराज हो जाती थी। उसकी यह नाराजगी उसके बाहरी व्यवहार में भी झलक जाती थी। कभी-कभी तो उतनी झुँझला उठती, कि नौकरानी को ही रिसीवर उठाने के लिये बोल देती थी। और वह खुद अपने काम पर निकल जाती थी। ऐसा भी होता था कभी-कभी जब खुद अनजाने में अगर रिसीवर उठा भी लेती थी, तो इधर-उधर की असंगत बातें करके ज...

दिग्वलय / जगदीश मोहंती

“दिल्ली के लोग बहुत बडे ठग होते हैं न, अंकल&#160;?” पिंकी ने पूछा, काश! मैं उसको कह पाता कि ऐसी बात नहीं है बेटी। मनुष्य सब जगह समान होते हैं। दिल्ली के हो या भुवनेश्वर के। न्यूयार्क के हो या कोलंबो के। मेरी स्कूल मास्टर वाली बुद्धि से पिंकी को समझाना उचित था, वास्तविक चीज होती है विश्वास। मनुष्य के ऊपर मनुष्य का विश्वास रहने की बात। जब मनुष्य के ऊपर मनुष्य का विश्वास टूट जाता है, इस धरती सही मायने में धरती नहीं रह जाती है। मगर मैं कह नहीं पाया. पिंकी के अंकल वाली आवाज के पास ही अटक गया।अंकल। जैसे मैं उसका बड़ा पिताजी नहीं हूँ। उसका पिता प्रकाश मेरा छोटा भाई होता है। वह मेरा कुछ नहीं है। यह बात सही है, पिंकी के साथ मेरी घनिष्ठता केवल दो दिन की थी।गांव की मिट्टी को कभी उसने छुआ नहीं। उसे मूल रूप से ओडिया नहीं कह सकते। उसकी ग्यारह वर्ष की यादों में मेरा कोई स्थान नहीं। शायद उसके सामने मैं बड़े पिताजी की जगह अंकल के रूप में ग्रहणीय था। कल मैं और पिंकी आगरा गए थे। प्रकाश ने ही सारी व्यवस्था कर दी थी। गरमी के दिनों की वजह से एअरकंडीशनर  बस की व्यवस्था की। बात हुई थी आगरा, मथुरा औ...